प्रकाशन, पब्लिसिटी और प्रोपगैन्डा : विनोबा

“प्रकाशन यानी चीजों को प्रकाश में लाना, लोगों के सामने असली रूप प्रकट करना। इससे गुण और दोष, दोनों सामने आते हैं। अगर कुछ गलती हुई हो तो, तो वह भी प्रकाशन में आनी चाहिए और सद्-विचार प्रकट हुआ हो, तो वह भी प्रकाशन में आना चाहिए।

विचारों का प्रकाशन करना है, प्रचार नहीं करना है। प्रकाशन जो होता है, वह अपने हृदय के द्वारा होता है, अपने जीवन के द्वारा होता है, वाणी के द्वारा होता है, सत्कर्म के द्वारा होता है। उसके अनेक द्वार हैं।

प्रचार जो होता है, वह केवल मुख के द्वारा होता है। मुख से बोलना, इतना ही प्रचार का अर्थ है। परंतु प्रकाशन मौन से भी हो सकता है। पूर्ण शुद्ध हृदय के कोई महात्मा हों और आशीर्वाद दें, तो उनके आशीर्वाद से भी प्रकाशन हो सकता है।

प्रकाश को अंधकार का अभाव नहीं कह सकते। प्रकाश वस्तु है, अंधकार अवस्तु है। प्रकाश में शक्ति होती है। अंधकार में कोई शक्ति नहीं होती। लाखों वर्षों के अंधकार में प्रकाश ले जाइए, एक क्षण में अंधकार का निवारण होगा।

‘प्रकाश’ बिल्कुल स्वतंत्र शब्द है। अपने हिन्दुस्तान का खास शब्द है। अंग्रेजी में एक शब्द है- ‘प्रोपगैन्डा’। वह बिल्कुल ऊपर-ऊपर की चीज है। दूसरा शब्द है, ‘पब्लिसिटी’ (प्रसिद्धि, प्रसारण)। पब्लिसिटी भी नहीं होनी चाहिए।

शुद्ध विचार लोगों को समझाएँ। उन विचारों का प्रकाश हम अपने व्यवहार और प्रयोगों में बढ़ाएँ। वह विचार मजबूत, गंभीर और व्यापक हो।

‘पब्लिसिटी’ से पुण्यक्षय होता है। ‘प्रकाशन’ से पुण्य फैलता है।”

ऐसा कहा था विनोबा ने। विनोबा को जानने-समझने वाले एक साथी ने हाल में बताया कि विनोबा ने एक बार यह भी कहा था— “आज अगर हम दूर-दूर तक देख सकते हैं, तो वह इसलिए कि हम अपने पूर्वजों के कंधे पर खड़े हैं।”

अब समझ में आता है कि कैसे विनोबा जैसे प्रकाशित और प्रकाशमान पूर्वजों के कंधे पर खड़े होकर जीवन, समाज और राजनीति की भी सब चीजें दूर-दूर तक स्पष्ट दिखाई देती हैं।

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